Wednesday, 13 February 2019

فقدان 300 سيارة فخمة في أعقاب قمة "أبيك" في بابوا غينيا الجديدة

تسعى الشرطة في بابوا غينيا الجديدة إلى استعادة ما يقرب من 300 سيارة، كانت أعيرت لمسؤولين خلال قمة التعاون الاقتصادي لآسيا والمحيط الهادئ (أبيك) الذي استضافته العام الماضي.
وقد استوردت الدولة المضيفة، التي تعاني من الفقر، أسطولا فاخرا من السيارات ليستخدمها قادة الدول الزائرة خلال مشاركتهم في القمة.
وقال قائد الشرطة يوم الثلاثاء إن 284 سيارة مفقودة. و قد شُكلت وحدة شرطة خاصة للعثور على السيارات في العاصمة بورت مورسبي.
وقال مفتش الشرطة، دنيس كوركوران، لوكالة رويترز للأنباء "سُلمت 284 سيارة لأفراد لاستخدامها خلال القمة لكنها لم تُعد".
وأضاف إنها "تشمل سيارات من أنوع لاندكروزر وفورد ومازدا وباجيرو"
وقد أكد كوركوران أن الشرطة تمكنت من العثور على بعض السيارات غالية الثمن من نوع مازراتي والتي تقدر قيمتها بأكثر من مئة ألف دولار.
وأضاف أن " 40 سيارة من نوع مازراتي و3 سيارات من نوع بنتلي، وجدت في حالة ممتازة وأخفيت في رصيف المرفأ القديم بالقرب من رصيف الميناء الرئيسي".
وذكرت الشرطة أن "تسعا من السيارات المفقودة قد سرقت، وأزيلت أجزاء من بعضها وقد استُرجعت بعض السيارات لكنها كانت متضررة بشكل كبير"
وكان قادة بابوا غينيا الجديدة، التي يبلغ عدد سكانها 7.3 مليون نسمه، يعولون على هذه القمة العالمية في جذب الاستثمار ولفت الانتباه الدولي للبلد.
وقد استنزفت استضافة القمة موارد البلاد، وتطلبت المساعدة من دول أخرى، إذ ارسلت أستراليا والولايات المتحدة ونيوزيلاندا قوات خاصة لحماية وفود الدول المشاركة.
وتساءل صحفيون ونشطاء عما إذا كان من المنطقي أن تستضيف دولة من دول المحيط الهادئ الفقيرة حدثًا دوليًا مثل قمة أبيك.
ورأى منتقدون أن استيراد كل هذه السيارات، إهدار للمال.
دان الرئيس الأمريكي دونالد ترامب الهجمات على وسائل الإعلام، بعد اعتداء على مصور بي بي سي أثناء تغطية تجمع خاص بمؤيدي الرئيس في ولاية تكساس، يوم الاثنين.
لكن بيان البيت الأبيض الذي حمل إدانة ترامب لم يشر صراحة إلى حادث الاعتداء على مصور بي بي سي.
وجاء في البيان إن "الرئيس يدين جميع أعمال العنف ضد أي فرد أو جماعة، بمن فيهم الذين يعملون في الصحافة".
وتعرض مصور بي بي سي رون سكاينس، للدفع والاعتداء بقوة من شخص كان يرتدي قبعة تحمل شعار ترامب الشهير "لنجعل أمريكا عظيمة مرة أخرى" أثناء تغطية تجمع حاشد لأنصار الرئيس في مدينة إل باسو بولاية تكساس.
وبعد ذلك طلبت بي بي سي من البيت الأبيض مراجعة سبل ضمان سلامة وسائل الإعلام التي تحضر اجتماعات الرئيس ترامب.
وقالت بي بي سي في رسالتها إلى البيت الأبيض، إن منطقة وجود وسائل الإعلام لم تخضع لمراقبة، ولم يتدخل أحد من أفراد الأمن أثناء الحادث.
وجاء في بيان البيت الأبيض، على لسان السكرتيرة الصحفية سارة ساندرز: "نطلب من أي شخص يشارك في أي فاعلية أن يلزم الاحترام والسلمية".
وكان ترامب قد انتقد بعض وسائل الإعلام، ووصفها بـ"عدو للشعب".
وبعد حادث يوم الاثنين، شكر فريق حملة ترامب قوات إنفاذ القانون لإخراج الرجل المجهول الهوية من مكان التجمع.
وقال مايكل جلازنر، المسؤول التنفيذي الأول عن موقع ترامب من أجل الرئاسة "تم إخراج شخص قام بالتحام جسدي مع مصور إخباري أثناء لقاء الليلة الماضية".
وأضاف "نقدر الإجراء السريع من أمن المكان ومسؤولي إنفاذ القانون".
وبحسب المصور فإن الرجل، الذي قال عنه مسؤول في حملة ترامب إنه كان مخمورا، "قد دفعه بقوة شديدة".
وقال سكاينس إن الرجل كاد أن يسقطه وجهز التصوير الذي كان يستخدمه أرضا مرتين، قبل أن يسيطر عليه أحد المنظمين ويبعده.
رأى الرئيس ترامب الهجوم، وتأكد من أنهم كانوا على ما يرام ورفع إبهامه لأعلى (إشارة إلى أن كل شيء جيد) ثم واصل خطابه بعد أن رد عليه المصور بنفس الإيماءة.
وكان يقف أمام الكاميرا منتجة بي بي سي في واشنطن إليانور مونتاغو، ومراسلها في العاصمة الأمريكية غاري أودونوهو.
وقالت مونتاغو إن الشخص المحتج هاجم طواقم إخبارية أخرى لكن "سكاينس" "تحمل وطأة ذلك".

Wednesday, 2 January 2019

बुलंदी पर बांग्लादेश, भारत को भी छोड़ रहा पीछे

क्या यह ऑस्ट्रेलिया की सबसे कमज़ोर फ़ील्डिंग वाली टीम है.
इसे लेकर विजय लोकपल्ली का मानना है कि यह ऑस्ट्रेलिया की अब तक की सबसे कमज़ोर फ़ील्डिंग ही नहीं सबसे कमज़ोर बल्लेबाज़ी वाली टीम भी है.
इस बात को तो भारत के पूर्व कप्तान सुनील गावस्कर और ऑस्ट्रेलिया के पूर्व कप्तान इयान चैपल भी कह चुके हैं. ज़ाहिर है जब उनकी बैटिंग ख़राब चल रही है तो भारत के गेंदबाज़ तो कामयाब होंगे ही.
ऑस्ट्रेलिया के सबसे भरोसेमंद बल्लेबाज़ उस्मान ख़्वाजा हों या फिर एरोन फिंच, शॉन मार्श, कप्तान टिम पेन और ट्रेविस हेड यह सभी अच्छी शुरुआत को बड़े स्कोर में नहीं बदल पा रहे हैं.
भारतीय खेमे के लिए इस सिरीज़ में सबसे बड़ा सिरदर्द उसकी सलामी जोड़ी रही है. शुरुआती दो मैचों में के.एल. राहुल और मुरली विजय की सलामी जोड़ी बुरी तरह असफल रही.
उनकी जगह तीसरे टेस्ट में मयंक अग्रवाल के साथ हनुमा विहारी को उतारा गया जिन्होंने कुछ बेहतर शुरुआत ज़रूर दिलाई.
हालांकि, हनुमा विहारी नियमित ओपनर नहीं हैं, इसलिए ओपनिंग की समस्या अभी भी टीम के लिए बनी हुई है.
इस पर विजय लोकपल्ली मानते हैं कि पुराने समय की तरह यह समस्या उभर आई है. अगर सलामी जोड़ी अच्छी शुरुआत देती है तो फिर टेस्ट मैच पर बहुत पहले से ही पकड़ बन जाएगी.
ख़ैर जो भी हो मैच में मिली जीत तमाम उठते सवालों को समाप्त कर देती है और एक हार कई सवाल खड़े भी करती है.
सिडनी में जीत के लिए भारत पहले से ही कमर कसे हुए है. विराट कोहली किसी भी क़ीमत पर ऑस्ट्रेलिया में पहली बार टेस्ट सिरीज़ जीतने का मौक़ा गंवाना नही चाहते.
बस देखना इतना है कि क्या ऑस्ट्रेलिया पर्थ की तरह पलटवार करने में कामयाब तो नहीं हो जाएगी. जो भी हो सारे समीकरण फिलहाल तो भारत के पक्ष में ही हैं.
इन दिनों टेस्ट मैच के ड्रॉ होने का चलन समाप्त हो चुका है. सिडनी में सारा दबाव ऑस्ट्रेलिया पर ही होगा.
भारत ने ऑस्ट्रेलिया में पहली बार साल 1947-48 में कोई टेस्ट सिरीज़ खेली थी. तब से लेकर आज तक भारत कभी भी ऑस्ट्रेलिया में टेस्ट सिरीज़ नहीं जीत सका.
नए साल में विराट कोहली की टीम भारत को यह तोहफ़ा दे सकती है.
1971 में पाकिस्तान से आज़ादी की लड़ाई के बाद बांग्लादेश ने कई त्रासदियों को झेला है. भयावह ग़रीबी, प्राकृतिक आपदा और अब दुनिया के सबसे बड़े शरणार्थी संकट से बांग्लादेश जूझ रहा है. सात लाख 50 हज़ार रोहिंग्या मुसलमान पड़ोसी म्यांमार से अपना घर-बार छोड़ बांग्लादेश में आ गए हैं.
इतना कुछ होने के बावजूद बांग्लादेश अपनी आर्थिक सफलता की नई इबारत लिख रहा है. हालांकि बांग्लादेश की इस सफलता की चर्चा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उस रूप में नहीं हुई.
मैन्युफ़ैक्चरिंग सेक्टर में बांग्लादेश तेज़ी से प्रगति कर रहा है. कपड़ा उद्योग में बांग्लादेश चीन के बाद दूसरे नंबर पर है. हाल के एक दशक में बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था औसत 6 फ़ीसदी की वार्षिक दर से आगे बढ़ी है. साल 2018 जून महीने में यह वृद्धि दर 7.86 फ़ीसदी तक पहुंच गई थी.
1974 में भयानक अकाल के बाद 16.6 करोड़ से ज़्यादा की आबादी वाला बांग्लादेश खाद्य उत्पादन के मामले में आत्मनिर्भर बन चुका है. 2009 से बांग्लादेश में प्रति व्यक्ति आय तीन गुनी हो गई है.
इस साल प्रति व्यक्ति आय 1,750 डॉलर हो गई. बांग्लादेश में बड़ी संख्या में लोग ग़रीबी में जीवन बसर कर रहे हैं लेकिन विश्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार प्रतिदिन 1.25 डॉलर में अपना जीवन चलाने वाले कुल 19 फ़ीसदी लोग थे जो अब 9 फ़ीसदी ही रह गए हैं.
शेख़ हसीना लगातार तीसरी बार बांग्लादेश की प्रधानमंत्री बनने जा रही हैं. हसीना के नेतृत्व में बांग्लादेश हाल के वर्षों में एशिया के सबसे सफल देशों में से एक उभरकर सामने आया है.
एक वक़्त था जब बांग्लादेश (उस वक़्त उसे पूर्वी पाकिस्तान कहा जाता था) पाकिस्तान का सबसे ग़रीब इलाक़ा था. 1971 में आज़ादी के बाद भी बांग्लादेश भीषण ग़रीबी में रहा. 2006 के बाद से बांग्लादेश की तस्वीर से धूल छंटने लगी और तरक़्क़ी की रेस में पाकिस्तान से आगे निकल गया.
'विकास दर में बांग्लादेश भारत को पीछे छोड़ देगा'
बांग्लादेश की वार्षिक जीडीपी वृद्धि दर पाकिस्तान से 2.5 फ़ीसदी आगे निकल गई. जाने-माने अर्थशास्त्री कौशिक बासु का कहना है कि बांग्लादेश विकास दर में भारत को भी पीछे छोड़ देगा.
बांग्लादेश की आबादी 1.1 फ़ीसदी दर से प्रति वर्ष बढ़ रही है जबकि पाकिस्तान की दो फ़ीसदी की दर से बढ़ रही है. इसका मतलब यह भी है कि पाकिस्तान की तुलना में बांग्लादेश में प्रति व्यक्ति आय भी तेज़ी से बढ़ रही है.
कहा जा रहा है कि बांग्लादेश बड़े शांत तरीक़े से अपना कायापलट कर रहा है. कौशिक बसु का मानना है कि बांग्लादेश के समाज के बड़े हिस्से में बदलाव की बयार है और यहां महिलाओं का सशक्तीकरण भी तेज़ी से हो रहा है. बांग्लादेश में एक व्यक्ति की औसत उम्र 72 साल हो गई है जो कि भारत के 68 साल और पाकिस्तान के 66 साल से ज़्यादा है.
विश्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार 2017 में बांग्लादेश में जिन लोगों का बैंक खाता है उनमें से 34.1 फ़ीसदी लोगों ने डिजीटल लेन-देन किया जो दक्षिण एशिया में औसत 27.8 फ़ीसदी ही है.

Thursday, 13 December 2018

من كلام العلماء عن الصدقة

من كلام العلماء عن الصدقة
* قال الإمام ابن القيم رحمه الله تعالى : (فإنَّ للصدقة تأثيرًا عجيبًا في دفع أنواع البلاء ولو كانت من فاجر أو من ظالم بل من كافر فإن الله تعالى يدفعُ بها عنهُ أنواعًا من البلاء وهذا أمر معلوم عند الناس خاصتهم وعامتهم وأهلُ الأرض كلُّهم مقرُّون به لأنَّهم جرَّبوه) (الوابل الصيب لابن القيم رحمه الله تعالى) .
* وقال رحمه الله تعالى في أسباب شرح الصدر : (ومنها الإحسانُ إلى الخلق ونفعُهم بما يمكنه من المال والجاه والنفع بالبدن وأنواع الإحسان فإن الكريم المحسن أشرحُ الناس صدرًا وأطيبهم نفسًا وأنعمُهم قلبًا والبخيل الذي ليس فيه إحسان أضيقُ الناس صدرًا وأنكدهم عيشًا وأعظمُهم همًا وغمًا..) (زاد المعاد لابن القيم ) .
* وقال رحمه الله تعالى : (... بل ها هنا من الأدوية التي تشْفي من الأمراض ما لمْ يهتد إليها عقولُ أكابر الأطباء ولم تصل إليها عُلومُهم وتجاربهم وأقيستهم من الأدوية القلبية والروحانية وقوة القلب واعتماده على الله تعالى والتوكل عليه والالتجاء إليه والانطراح والانكسار بين يديه والتذلَّل له الصدقة والدعاء والتوبة والاستغفار والإحسان إلى الخلق وإغاثة الملهوف والتفريج عن المكروب فإن هذه الأدوية قد جرَّبْتها الأمم على اختلاف أديانها ومللها فوجدوا لها من التأثير في الشفاء ما لا يصل إليه علم أعلم الأطباء ولا تجربته ولا قياسه وقد جرَّبنا نحن وغيرنا من هذا أمورًا كثيرةً ورأيناها تفعلُ ما لا تفعل الأدوية الحسية...) (زاد المعاد لابن القيم ) .
* وقال رحمه الله تعالى: (كان صلى الله عليه وسلم أعظم الناس صدقةً بما ملكت يدهُ وكان لا يستكثر شيئًا أعطاه لله تعالى ولا يستقلُّه وكان لا يسألُه أحدٌ شيئًا عنده إلا أعطاه قليلاً كان أو كثيرًا وكان عطاؤه عطاء مَنْ لا يخافُ الفقر وكان العطاءُ والصدقةُ أحبَّ شيء إليه وكان سرورُه وفرحُه بما يعطيه أعظمَ من سرور الآخذ بما يأخذه وكان أجود الناس بالخير يمينه كالرِّيح المرسلة وكان إذا عرض له محتاج آثره على نفسه تارةً بطعامه وتارةً بلباسه وكان ينوِّع في أصناف عطائه وصدقته فتارةً بالهبة وتارةً بالصدقة وتارة بالهدية وتارة بشراء الشيء ثم يعطي البائع الثمن والسلعة جميعًا كما فعل ببعير جابر وتارةً كان يقترض الشيء فيرد أكثر منه وأفضل وأكبر ويشتري الشي فيعطي أكثر من ثمنه ويقبل الهدية ويكافئ عليها بأكثر منها أو بأضعافها تلطُّفا وتنوُّعا في ضروب الصدقة والإحسان بكلِّ ممكن وكانت صدقُته وإحسانُه بما يملكه وبحاله وبقوله فيُخرجُ ما عنده ويأمر بالصدقة ويحضُّ عليها ويدعو إليها بحاله وقوله فإذا رآه البخيلُ الشحيح دعاه حاله إلى البذل والعطاء وكان مَنْ خالَطَهُ وصحبَه ورأى هديه لا يملك نفسه من السماحة والندى وكان هديه صلى الله عليه وسلم يدعو إلى الإحسان والصدقة والمعروف ولذلك كان صلى الله عليه وسلم أشرحَ الخلق صدرًا وأطيبَهم نفسًا وأنعمهم قلبًا فإن للصدقة وفعل المعروف تأثيرًا عجيبًا في شرح الصدر وانضاف ذلك إلى ما خَصَّه الله به من شرح صدره بالنبوة والرسالة وخصائصها وتوابعها وشرح صدره حسًا وإخراج حظِّ الشيطان منه) (زاد المعاد لابن القيم ) .


قال الأصمعي : حدثنا هشام بن سعد صاحب المحمل : عن أبيه قال : قال حكيم بن حزام : (ما أصبحتُ وليس ببابي صاحبُ حاجة إلا علمت أنها من المصائب التي أسأل الله الأجر عليها) (سير أعلام النبلاء للذهبي ) .
عن الحسن قال : رأى الأحنف في يَد رجل درهما فقال : لمن هذا ؟ قال : لي قَال : ليسَ هو لك حتى تخرجه في أجر أو اكتساب شكر وتمثل : أنت للمال إذا أمسكته وإذا أنفقته فالمال لك (سير أعلام النبلاء للذهبي ) .
قال الشيخ عطية محمد سالم رحمه الله تعالى عن الصدقة والتصدق : (فلا يقتصرُ على المال وما يقوَّمُ بالمال بل يشمل كل عمل صالح من طيب الكلمة وبشاشة الوجه وإعانة الرجل على دابته ومعاونته على حمل متاعه عليها وإنظار المعسر صدقة والتخفيف عنه بل قد تكون العبادة لله تعالى صدقة يتصدق بها العبدُ على أخيه المسلم كالذي جاء والناسُ قد صلوا العصر فقال صلى الله عليه وسلم : من يتصدق على هذا فيصلِّي معه ؟ أي : من يعيدُ الصلاة معه فتصدَّق عليه أبو بكر رضى الله عنه فمن أحكامها الآتي :
1- أن تكون طيبةً ومن كسب طيب ولعل أوَّل أثرِ من آثار هذا النوع أنه يعوِّد الإنسان كسبَ الحلال وأكله ومن البديهي أن الإنسان لا يقرِّب إلى الله شيئًا يبتغي مرضاته إلا إذا كان هذا الشيء طيبًا عند الله تعالى وإلا لكان بتقديمه غير الطيب جالبًا على نفسه سخط الله تعالى والله غنيٌّ عن ذلك وعن غيره .
2- أن تكون الصدقة عن ظهر غنى لأنه لا ينبغي للإنسان أن يتصدق بما تطلَّعُ إليه نفسه ويحتاجُه حتى لا يوقع الملامة في نفسه

Friday, 30 November 2018

تحدثت تقارير كثيرة، بعضها صادر عن منظمات دولية، عن استخدام أسلحة كيميائية

ونقلت وكالة أنباء الإمارات الرسمية، وام، عن بيان لوزارة الخارجية قولها "استندت القضية المرفوعة ضد .. هيدجز إلى أدلة قانونية من خلال فحص الأجهزة الإلكترونية الخاصة به .. والمعلومات الاستخبارية التي توصلت إليها أجهزة الأمن والاستخبارات الإماراتية والأدلة التي قدمها هيدجز بنفسه".
وقالت وكالة أنباء الإمارات الرسمية، وام، إن عائلة هيدجيز قدمت التماسا للعفو عنه إلى رئيس الدولة، "عبر موظفي القنصلية البريطانية" والقنوات الرسمية.
وسوف يُسمَح للأكاديمي البريطاني "بمغادرة الدولة فور اكتمال الإجراءات الرسمية"، بحسب ما قالته الوكالة.
شنت روسيا غارات جوية تستهدف مسلحين من المعارضة السورية، قائلة إنهم نفذوا هجوما كيمياويا على مدينة حلب.
وبحسب السلطات الروسية والسورية، فإن قذائف تحوي غاز الكلور السام أدت إلى إصابة العشرات في وقت متأخر السبت.
وعرضت وسائل إعلام حكومية صورا لمواطنين من حلب يتلقون العلاج، ويواجهون صعوبة في التنفس.
وينفي مسلحو المعارضة شن أي هجمات كيمياوية، ويقولون إن الادعاء سيستخدم كذريعة من أجل شن هجمات على مناطق يسيطرون عليها.
وبحسب ما نقلته وكالة الأنباء السورية (سانا) عن وزارة الخارجية، فإن مدينة حلب "استهدفت بعشرات قذائف الهاون المحشوة بمادة الكلور ما أدى إلى إصابة 107 من المدنيين".
وقالت وزارة الدفاع الروسية إن القذائف أطلقت من منطقة في محافظة إدلب يسيطر عليها فصيل من المعارضة المسلحة.
وذكرت أن طائراتها الحربية شنت غارات على مواقع تقول إن مسلحين "إرهابيين" فيها قصفوا مدنيين في مدينة حلب مساء السبت.
وكان المرصد السوري لحقوق الإنسان قد قال إن حوالي 100 شخص ، بينهم نساء وأطفال، قد تلقوا العلاج بسبب صعوبات بالتنفس بعد تعرض الأجزاء الغربية من مدينة حلب للقصف.
وقال زاهر بطل، رئيس نقابة الأطباء في حلب، لوكالة أنباء رويترز إن هذا هو الهجوم الكيمياوي الأول على المدنيين في حلب منذ بداية النزاع عام 2011، لكن عبد السلام عبد الرزاق أحد مسؤولي منظمة "نور الدين زنكي" المعارضة نفي التقارير وقال إنها كاذبة.
وكانت بلدان غربية والأمم المتحدة قد اتهمت القوات الحكومية السورية باستخدام غاز أعصاب مرات عدة خلال النزاع المستمر منذ أعوام.
أيدت محكمة النقض المصرية حكما بإعدام 9 أشخاص لإدانتهم باغتيال النائب العام السابق هشام بركات.
كما خففت المحكمة أحكاما صادرة بحق 6 متهمين آخرين لتصل إلى عقوبة السجن المؤبد، بينما برأت خمسة آخرين.
وتعد محكمة النقض أعلى سلطة قضائية في مصر، وتعد أحكامها نهائية ولا يجوز الطعن فيها.
وقُتل النائب العام المصري السابق في هجوم بسيارة مفخخة نهاية يونيو/ حزيران 2015، عن عمر يناهز 65 عاما.
وفي يوليو/ تموز عام 2017، أصدرت محكمة جنائية في القاهرة حكما بإعدام 28 شخصا، والسجن المؤبد بحق 15 آخرين. وشملت القضية 23 شخصا آخرين، صدرت أحكام بسجنهم لفترات متفاوتة.
ووجهت النيابة العامة إلى المتهمين اتهامات بالقتل العمد والشروع في قتل مواطنين وحيازة وأسلحة نارية ومفرقعات والانضمام إلى جماعة أسست على خلاف القانون.
قالت وسائل إعلام سورية إن مسلحي المعارضة قصفوا مدينة حلب بعشرات القذائف التي تحتوي على غازات سامة، وذلك في الوقت الذي أكد نشطاء مقتل تسعة أشخاص جرّاء قصف من جانب الجيش السوري على مدينة إدلب الواقعة تحت سيطرة المعارضة.
وقالت وكالة الأنباء السورية (سانا) إن "التنظيمات الإرهابية المنتشرة في ريف حلب استهدفت بقذائف تحتوي على غازات سامة أحياء الخالدية وشارع النيل وجمعية الزهراء في حلب". وأشارت إلى ان القصف المزعوم وقع مساء السبت.
ونقلت (سانا) عن مسوؤل طبي قوله إن الهجوم أسفر عن إصابة 50 شخصا بصعوبات في التنفس.
وقال شاهد عيان، من خارج مستشفى الرازي في حلب، إن من بين المصابين أطفال ونساء.
كما قال المرصد السوري إن القصف الذي استهدف حلب، الخاضعة لسيطرة الحكومة السورية، أسفر عن إصابة 32 شخصا على الأقل، من بينهم ستة أطفال، بصعوبات في التنفس.

Tuesday, 13 November 2018

पेड न्यूज़: चुनावी मौसम में कौन ख़रीद रहा है आपकी ख़बरें

बीबीसी की ख़ास रिसर्च 
छत्तीसगढ़ के अलावा मध्यप्रदेश, राजस्थान, तेलंगाना और मिज़ोरम में चुनाव होने जा रहे हैं. इन राज्यों में चुनाव के साथ देश भर में एक तरह से 2019 के आम चुनाव की मुनादी हो जाएगी.
चुनावों का ना केवल सरकारों पर असर होता है बल्कि ख़बरों की दुनिया पर भी इसका प्रभाव देखने को मिलता है.
समाचार माध्यमों में चुनावी ख़बर प्रमुखता से नज़र आने लगती हैं. नेताओं के चुनावी दौरों और चुनावी वादों की बड़ी-बड़ी तस्वीरें, बैनर और टीवी चैनलों पर लाइव डिस्कशन की तादाद बढ़ जाती है. इस दौरान नेता और राजनीतिक दल अपने अपने हक़ में हवा बनाने के लिए अपने पक्ष की चीज़ों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हैं.
इसके लिए मीडिया प्लेटफ़ॉर्म्स में ख़बरों के बीच पेड न्यूज़ का घालमेल इस तरह होता है कि वो एकपक्षीय समाचार या विश्लेषण होते हैं, जो आम मतदाताओं के नज़रिये को प्रभावित करते हैं.
वरिष्ठ टीवी पत्रकार राजदीप सरदेसाई कहते हैं, "चुनाव के समय इसीलिए आपको नए अख़बार और टीवी चैनल दिखाई देने लगते हैं. वो इस मौक़े को भुनाने के लिए ही बाज़ार में आते हैं. लेकिन अब बात केवल वहीं तक सीमित नहीं रह गई है. क्षेत्रीय मीडिया ही नहीं बल्कि बड़े-बड़े अख़बार और मीडिया समूह भी इस मौक़े को भुनाना चाहते हैं."
ये खेल किस तरह होता है, इसका अंदाज़ा चुनाव आयोग के आंकड़ों से होता है. बीते चार साल में 17 राज्यों में हुए चुनाव के दौरान पेड न्यूज़ की 1400 से ज़्यादा शिकायतें सामने आई हैं.
बीते पंजाब विधानसभा चुनाव के दौरान पेड न्यूज़ की 523, गुजरात चुनाव में 414 और हिमाचल चुनाव में 104 शिकायतें सामने आईं थीं. इस साल कर्नाटक में हुए चुनाव में पेड न्यूज़ की 93 शिकायतें दर्ज की गईं.
इन शिकायतों से स्पष्ट है कि पेड न्यूज़ के मामले दर्ज हो रहे हैं. यही वजह है कि चुनाव आयोग ने चुनावी ख़र्चे के लिए निगरानी समिति का गठन किया है जो उम्मीदवारों के ख़र्च पर नज़र रखती है.
छत्तीसगढ़ में कुछ अख़बारों और ख़बरिया चैनलों में संपादकीय ज़िम्मेदारी निभा चुके दिवाकर मुक्तिबोध कहते हैं, "पेड न्यूज़ का मामला नया तो नहीं है, लेकिन अब इसका रूप व्यापक हो चुका है. हर अख़बार और चैनल चुनाव को पैसे बनाने के मौक़े के तौर पर देखते हैं, लिहाज़ा उनका उम्मीदवारों और राजनीतिक दलों से एक तरह का अघोषित समझौता होता है और पक्ष में ख़बरों के ज़रिए माहौल तैयार कराया जाता है."
में हमने पाया कि दुनिया के दूसरे हिस्सों के साथ-साथ भारत में फ़ेक न्यूज़ का प्रसार कितनी तेज़ी से और किस तरह बढ़ रहा है.
लेकिन ख़बरों की दुनिया में फ़ेक न्यूज़ कोई अकेली बीमारी नहीं है. एक ऐसी ही बीमारी है पेड न्यूज़, जिसने मीडिया को अपनी चपेट में ले रखा है. कई बार दोनों का रूप एक भी हो सकता है और कई बार अलग अलग भी. वैसे पेड न्यूज़ की बीमारी को आप थोड़ा गंभीर इसलिए मान लें क्योंकि इसमें बड़े-बड़े मीडिया संस्थानों से लेकर दूर दराज़ के क़स्बाई मीडिया घराने शामिल हैं.
पेड न्यूज़, जैसा कि नाम से ही ज़ाहिर है वैसी ख़बर जिसके लिए किसी ने भुगतान किया हो. ऐसी ख़बरों की तादाद चुनावी दिनों में बढ़ जाती है और छत्तीसगढ़ में पहले चरण के मतदान के साथ ही देश के पांच राज्यों के चुनावी घमासान की शुरुआत हो चुकी हैचुनाव आयोग मध्य प्रदेश चुनावों को लेकर अतिरिक्त सर्तकता भी बरत रहा है, क्योंकि 2013 के विधानसभा चुनाव में इस राज्य से पेड न्यूज़ की 165 शिकायतें सामने आईं थीं.
मध्य प्रदेश के इंदौर में लंबे समय से पत्रकारिता कर रहे वरिष्ठ पत्रकार समीर ख़ान बताते हैं, "पेड न्यूज़ का तौर तरीक़ा बदलता रहा है, एक नया तरीक़ा तो ये भी है कि भले आप हमारे पक्ष में कुछ नहीं छापो, लेकिन हमारे ख़िलाफ़ वाली ख़बर तो बिल्कुल मत छापो. मतलब आप कुछ नहीं भी छापेंगे तो भी आपको पैसे मिल सकते हैं और ये ख़ूब हो रहा है."
भारत में पेड न्यूज़ की स्थिति को लेकर भारतीय प्रेस काउंसिल की एक सब-कमेटी की ओर से परंजॉय गुहा ठाकुराता और के श्रीनिवास रेड्डी ने मिलकर एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार की थी. लंबे समय तक उसे सार्वजनिक नहीं किया गया. फिर 2011 में तत्कालीन केंद्रीय सूचना आयुक्त के आदेश के बाद इस रिपोर्ट को जारी किया गया.

Wednesday, 17 October 2018

सबरीमला मंदिर में महिलाएं ना आएं, इसकी कोशिशें जारी

केरल के जानेमाने सबरीमला मंदिर के कपाट खुलने का वक्त जैसे-जैसे नज़दीक आ रहा है, स्वामी अयप्पा के दर्शन के लिए आने वाली महिला भक्तों पर दवाब बढ़ता जा रहा है.
सबरीमला मंदिर के कपाट 17 अक्तूबर को खोले जाएंगे. यहां महिलाओं को प्रवेश ना देने को लेकर कई कोशिशें हो रही हैं.
दबाव बढ़ाने की राजनीति भी गरमाती जा रही है. पूरी कोशिश की जा रही है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा मंदिर में प्रवेश के लिए महिलाओं को दिए गए अधिकार का पालन ना हो सके.
मंदिर के प्रवेश द्वार के नज़दीक दर्शन के लिए आ रही महिलाओं को बसों और कारों से निकाला जा रहा है. इन्हें द्वार पर मौजूद दूसरी महलाएं वापिस जाने के लिए कह रही हैं. उनकी दलील है कि महिलाओं के प्रवेश देना परंपराओं के अपमान होगा.
इनमें से एक महिला निशा मनी ने बीबीसी से बात की और कहा, "जो महिलाएं बसों से आएंगी हम उन्हें रोकेंगे. हम उन्हें नीचे उतरने के लिए कहेंगे और उन्हें पूरा मुद्दा समझाएंगे." हम कई सालों से मंदिर और इसमें विराजे देवता के उपासक है और हम ऐसे लोगों को मंदिर में नहीं जाने देंगे जिन्हें नहीं जाना चाहिए. ये हमारे परंपरा की बात है. हम अपने नियमों का पालन करेंगे."
निशा मनी की सोच और कुछ वैसी ही है जैसी एक संगठन, अयप्पा धर्म सेना की. धर्म सेना ने कहा है कि 17 अक्टूबर को मंदिर का दरवाज़ा खुलने पर अंदर जाने वाली महिलाओं को पुरुषों और महिला कार्यकर्ताओं के ऊपर से चलकर मंदिर में प्रवेश करना होगा.
धर्म सेना का कहना है कि महिलाओं को रोकने के लिए पुरुष और महिला कार्यकर्ता मंदिर के सामने ज़मीन पर लेट जाएंगे.
अयप्पा धर्म सेना के राहुल ईश्वर ने बीबीसी हिंदी को बताया, "हम गांधीवादी तरीका अपनाएंगे और रास्ते के बीच ज़मीन पर लेट जाएंगे. अगर आप मंदिर में प्रवेश करना चाहते हैं, तो आपको इसके लिए हमारे सीने पर पैर रख कर आगे बढ़ना होगा."
ईश्वर कहते हैं, "हम किसी भी तरह की हिंसा में शामिल नहीं हो रहे हैं. हम किसी को आने से रोक भी नहीं रहे हैं या किसी को परेशान नहीं कर रहे हैं. हम गांधीवादी तरीके से पीड़ित की भूमिका निभाने के लिए तैयार हैं. हम चाहते हैं कि हमारी नारीवादी बहनें हमारी भावनाओं का सम्मान करें."
सबरीमला मंदिर पूजा के लिए पांच दिनों तक खोला जाता है. ईश्वर ज़ोर देकर कहते हैं कि "उनकी सेना का कदम सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन नहीं करेगा."
अदालत ने 10 से 50 वर्ष की आयु वर्ग की महिलाओं को स्वामी अयप्पा के मंदिर में प्रवेश करने के लिए अनुमति दे दी थी. श्वर का बयान उस दिन आया जब भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की अगुवाई में पांडलम से शुरु हुआ मार्च राजधानी तिरुवनंतपुरम पहुंचा. पांडलम का शाही परिवार सबरीमला मंदिर के संरक्षक हैं.
हालांकि भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष श्रीधरन पिल्लई कहते हैं कि उनकी पार्टी 'कानून तोड़ने' और मंदिर में महिलाओं का प्रवेश रोकने के पक्ष में कतई नहीं है.
पिल्लई कहते हैं कि इस मार्च का आयोजन इसलिए किया गया था ताकि वो स्वामी अय्यप्पा के भक्तों को बता सकें कि उनकी पार्टी 'सबरीमाला को बचाना' चाहती है.
पिल्लई ने सीपीएम की अगुवाई वाली वाम मोर्चा सरकार पर निशाना साधा और कहा कि सबरीमला की परंपरा को ख़त्म करने के लिए वो लोग सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का इस्तेमाल करने की कोशिश कर रहे हैं.
वो कहते हैं कि लाखों लोगों ने इस मार्च का समर्थन किया है, "सरकार को इस विरोध के मायने समझने चाहिए और अपना रुख़ बदलना चाहिए."
वो कहते हैं कि इस मार्च का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि सरकार इस मामले में एक रिव्यू पीटीशन दायर करे और ये सुनिश्चित करे कि कैसे परंपरा फिर से बहाल हो सके.
अदालत के आदेश के बावजूद, ऐसा नहीं लग रहा कि स्वामी अयप्पा मंदिर में महिला भक्तों के लिए आने वाला वक्त आसान होने जा रहा है.
कन्नूर ज़िले में रहने वाली कॉलेज शिक्षिका रेशमा निशांत ने अपने फ़ेसबुक पन्ने पर लिखा कि वो इस बार मंदिर जा रही हैं क्योंकि अदालत का आदेश उनके उस सपने को पूरा कर रहा है जो उन्होंने लंबे वक्त से देखा है.
सोशल मीडिया पर उनके इस पोस्ट की कई लोगों ने आलोचना की है. कई लोगों ने तो उनके घर के सामने विरोध प्रदर्शन किया, नारे लगाए, उन्हें गालियां दीं. उन्हें ये धमकी भी दी गई कि अगर उन्होंने मंदिर में प्रवेश करने की कोशिश की तो उन्हें इसके गंभीर परिणाम भुगतने होंगे.
रेशमा निशांत कहती हैं, "मैंने उन्हें कुछ नहीं कहा. मुझे नहीं लगता कि वो किसी जवाब के हकदार भी हैं. मैंने इस मामले में पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है."
रेशमा लंबे समय से व्रत रख रही हैं. हर साल की तरह इस साल भी उन्होंने 41 दिनों तक उपवास में रहने की शपथ ली है.
वो कहती हैं, "इस बार, मेरे उपवास का 41वां दिन 17 अक्टूबर को पड़ेगा. इसलिए मैं 18 अक्तूबर को मंदिर जा सकती हूं."स बीच त्रावनकोर देवसम बोर्ड ने मंगलवार को पुजारियों के परिवार, पांडलम के शाही परिवार और अयप्पा सेवा संघ के अधिकारियों की एक बैठक बुलाई है. बैठक में मंदिर में प्रवेश करने संबंधी गतिरोध को ख़त्म करने पर चर्चा होगी ताकि पूजा की जा सके.
इससे पहले पिनाराई विजयन ने एक बैठक बुलाई थी जिसमें हिस्सा लेने से इन तीनों पक्षों ने इनकार कर दिया था.
मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ये साफ कर दिया है कि उनकी सरकार सुप्रीम कोर्ट में इस मामले में पुनर्विचार के लिए कोई याचिका दाखिल नहीं करेगी.
उनका कहना है कि इसके उलट उनकी सरकार एक शपथपत्र दाखिल कर कहा है कि सभी उम्र की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश दिया जाना चाहिए.
17 अक्तूबर यानी कपाट खुलने वाले दिन महिलाओं की सुरक्षा के मद्देनज़र उन्होंने कहा है, "हर हाल में कानून व्यवस्था बनाए रखने की कोशिश होगी ".
उन्होंने अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (साऊथ ज़ोन) अनिल कांत को स्थिति पर नज़र बनाए रखने के लिए कहा है और आदेश दिए हैं कि जो महिलाएं मंदिर में प्रवेश करना चाहती हैं उनके लिए उचित व्यवस्था की जाए ताकि वो बिना बाधा दर्शन कर सकें.

विदेशी मीडिया में छाया योगी का 'प्रयागराज' फ़ैसला

लाहाबाद का नाम प्रयागराज करने का फ़ैसला अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भी सुर्खियां बटोर रहा है. मंगलवार को उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार की कैबिनेट ने यह फ़ैसला लिया था.
ब्रिटेन के प्रमुख अख़बार द गार्डियन
द गार्डियन ने उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थनाथ सिंह के उस बयान का ज़िक्र किया है, जिसमें उन्होंने कहा था, ''इस शहर का नाम शुरू से ही प्रयागराज था. जो इस फ़ैसले का विरोध कर रहे हैं उन्हें सोचना चाहिए कि अगर माता-पिता का दिया उनका नाम बदल दिया जाए तो कैसा लगेगा?''
द गार्डियन ने लिखा है कि इस शहर का संबंध नेहरू-गांधी ख़ानदान से भी है जिसने भारत को तीन प्रधानमंत्री दिए. इसमें देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू भी शामिल हैं.
ब्रिटेन के ही अख़बार द इंडिपेंडेंट ने लिखा है, ''इस बदलाव का मक़सद पुराने नाम को बहाल करना है. मुस्लिम शासक अकबर ने 1583 में प्रयाग का नाम बदलकर इलाहाबाद कर दिया था.''
हालांकि प्रदेश की विपक्षी पार्टियां इस फ़ैसले का विरोध कर रही हैं. वहीं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा है कि जो भारत के इतिहास और परंपरा की समझ नहीं रखते हैं, वही इस फ़ैसले पर सवाल उठा रहे हैं.
द गार्डियन ने नाम बदलने के बहाने शहर की अहमियत का भी उल्लेख किया है.
गार्डियन की रिपोर्ट में लिखा गया है, ''इसी शहर में
मध्य-पूर्व के प्रमुख मीडिया घराना अल-जज़ीरा ने लिखा है, ''स्थानीय मीडिया के मुताबिक़, भारत के एक प्रांत उत्तर प्रदेश की सरकार ने अपने एक ऐतिहा
अल-जज़ीरा ने लिखा है, ''कई आलोचकों का ये भी कहना है कि इससे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हिंदू राष्ट्रवादी पार्टी भारत के विविधिता से भरे इतिहास और पहचान को मिटाने की कोशिश कर रही है. उत्तर प्रदेश में एक महंत योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने कई जगहों के नामों को बदलने का प्रस्ताव दिया है. योगी आदित्यनाथ के ऊपर भारत के मुस्लिम अल्पसंख्यक समुदाय के ख़िलाफ़ हिंसा भड़काने का आरोप लग चुका है.''
अल-जज़ीरा ने यह भी लिखा है, ''बीते साल उन्होंने मुग़लसराय रेलवे स्टेशन का नाम बदलकर बीजेपी नेता दीन दयाल उपाध्याय के नाम पर रख दिया था. इसके साथ ही बरेली, कानपुर और आगरा के हवाई अड्डों के नामों को बदलने का प्रस्ताव दिया गया है. उत्तर प्रदेश की 22 करोड़ लोगों की आबादी में मुसलमानों का प्रतिशत लगभग 19 फीसदी है.''
सिक शहर का मुस्लिम नाम बदलकर हिंदुओं की मान्यताओं से जुड़ा नाम रख दिया है. अगर इलाहाबाद के इतिहास की बात करें तो ये भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू का गृह नगर हुआ करता था.''
अल-जज़ीरा ने लिखा है, ''इस शहर का नया नाम प्रयागराज गंगा और यमुना नदी के संगम की ओर इशारा करता है, जहां पर जनवरी 2019 में हिंदुओं का कुंभ मेला आयोजित होने जा रहा है. इससे पहले साल 2013 में कुंभ मेले में 10 करोड़ लोग शामिल हए थे.विपक्षी पार्टी कांग्रेस के प्रवक्ता ओंकार सिंह ने कहा है कि इस शहर का नाम बदलने से आज़ादी की लड़ाई में इस शहर के योगदान पर असर पड़ता है.''
कुंभ मेले का आयोजन होता है. ऐसा माना जाता है कि यह सबसे विशाल धार्मिक अनुष्ठान है. 2013 में कुंभ मेले का आयोजन किया गया था और इसमें 10 करोड़ लोग शामिल हुए थे. नाम बदलने की मांग लंबे समय से दक्षिणपंथी हिन्दू समूह कर रहे थे. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने मुगलसराय रेलवे स्टेशन का नाम बदलकर भी दीनदयाल उपाध्याय कर दिया था.''
ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है, ''कट्टर हिन्दू राष्ट्रवादी योगी के नेतृत्व वाले उत्तर प्रदेश के एक शहर का मुस्लिम नाम बदलकर हिन्दू मान्यता से जुड़ा नाम रख दिया है. आदित्यनाथ प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं और उन पर मुसलमानों के ख़िलाफ़ हिंसा भड़काने का आरोप है.''
अख़बार ने लिखा है, ''राज्य सरकार ने शहर के पुराने नाम को फिर से बहाल कर दिया है. इस शहर का पुराना नाम प्रयाग ही था, जिसे मुग़ल काल में 16वीं सदी के आख़िर में इलाहाबाद कर दिया गया था.''
द गार्डियन ने लिखा है, ''प्रयाग संस्कृत का शब्द है, जिसका मतलब होता है त्याग स्थल. हिन्दुओं का मानना है कि ब्रह्मांड के रचयिता ब्रह्मा ने शहर में जहां गंगा और यमुना नदी मिलती है, वहां पहला अर्पण किया था.''