Wednesday, 17 October 2018

सबरीमला मंदिर में महिलाएं ना आएं, इसकी कोशिशें जारी

केरल के जानेमाने सबरीमला मंदिर के कपाट खुलने का वक्त जैसे-जैसे नज़दीक आ रहा है, स्वामी अयप्पा के दर्शन के लिए आने वाली महिला भक्तों पर दवाब बढ़ता जा रहा है.
सबरीमला मंदिर के कपाट 17 अक्तूबर को खोले जाएंगे. यहां महिलाओं को प्रवेश ना देने को लेकर कई कोशिशें हो रही हैं.
दबाव बढ़ाने की राजनीति भी गरमाती जा रही है. पूरी कोशिश की जा रही है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा मंदिर में प्रवेश के लिए महिलाओं को दिए गए अधिकार का पालन ना हो सके.
मंदिर के प्रवेश द्वार के नज़दीक दर्शन के लिए आ रही महिलाओं को बसों और कारों से निकाला जा रहा है. इन्हें द्वार पर मौजूद दूसरी महलाएं वापिस जाने के लिए कह रही हैं. उनकी दलील है कि महिलाओं के प्रवेश देना परंपराओं के अपमान होगा.
इनमें से एक महिला निशा मनी ने बीबीसी से बात की और कहा, "जो महिलाएं बसों से आएंगी हम उन्हें रोकेंगे. हम उन्हें नीचे उतरने के लिए कहेंगे और उन्हें पूरा मुद्दा समझाएंगे." हम कई सालों से मंदिर और इसमें विराजे देवता के उपासक है और हम ऐसे लोगों को मंदिर में नहीं जाने देंगे जिन्हें नहीं जाना चाहिए. ये हमारे परंपरा की बात है. हम अपने नियमों का पालन करेंगे."
निशा मनी की सोच और कुछ वैसी ही है जैसी एक संगठन, अयप्पा धर्म सेना की. धर्म सेना ने कहा है कि 17 अक्टूबर को मंदिर का दरवाज़ा खुलने पर अंदर जाने वाली महिलाओं को पुरुषों और महिला कार्यकर्ताओं के ऊपर से चलकर मंदिर में प्रवेश करना होगा.
धर्म सेना का कहना है कि महिलाओं को रोकने के लिए पुरुष और महिला कार्यकर्ता मंदिर के सामने ज़मीन पर लेट जाएंगे.
अयप्पा धर्म सेना के राहुल ईश्वर ने बीबीसी हिंदी को बताया, "हम गांधीवादी तरीका अपनाएंगे और रास्ते के बीच ज़मीन पर लेट जाएंगे. अगर आप मंदिर में प्रवेश करना चाहते हैं, तो आपको इसके लिए हमारे सीने पर पैर रख कर आगे बढ़ना होगा."
ईश्वर कहते हैं, "हम किसी भी तरह की हिंसा में शामिल नहीं हो रहे हैं. हम किसी को आने से रोक भी नहीं रहे हैं या किसी को परेशान नहीं कर रहे हैं. हम गांधीवादी तरीके से पीड़ित की भूमिका निभाने के लिए तैयार हैं. हम चाहते हैं कि हमारी नारीवादी बहनें हमारी भावनाओं का सम्मान करें."
सबरीमला मंदिर पूजा के लिए पांच दिनों तक खोला जाता है. ईश्वर ज़ोर देकर कहते हैं कि "उनकी सेना का कदम सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन नहीं करेगा."
अदालत ने 10 से 50 वर्ष की आयु वर्ग की महिलाओं को स्वामी अयप्पा के मंदिर में प्रवेश करने के लिए अनुमति दे दी थी. श्वर का बयान उस दिन आया जब भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की अगुवाई में पांडलम से शुरु हुआ मार्च राजधानी तिरुवनंतपुरम पहुंचा. पांडलम का शाही परिवार सबरीमला मंदिर के संरक्षक हैं.
हालांकि भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष श्रीधरन पिल्लई कहते हैं कि उनकी पार्टी 'कानून तोड़ने' और मंदिर में महिलाओं का प्रवेश रोकने के पक्ष में कतई नहीं है.
पिल्लई कहते हैं कि इस मार्च का आयोजन इसलिए किया गया था ताकि वो स्वामी अय्यप्पा के भक्तों को बता सकें कि उनकी पार्टी 'सबरीमाला को बचाना' चाहती है.
पिल्लई ने सीपीएम की अगुवाई वाली वाम मोर्चा सरकार पर निशाना साधा और कहा कि सबरीमला की परंपरा को ख़त्म करने के लिए वो लोग सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का इस्तेमाल करने की कोशिश कर रहे हैं.
वो कहते हैं कि लाखों लोगों ने इस मार्च का समर्थन किया है, "सरकार को इस विरोध के मायने समझने चाहिए और अपना रुख़ बदलना चाहिए."
वो कहते हैं कि इस मार्च का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि सरकार इस मामले में एक रिव्यू पीटीशन दायर करे और ये सुनिश्चित करे कि कैसे परंपरा फिर से बहाल हो सके.
अदालत के आदेश के बावजूद, ऐसा नहीं लग रहा कि स्वामी अयप्पा मंदिर में महिला भक्तों के लिए आने वाला वक्त आसान होने जा रहा है.
कन्नूर ज़िले में रहने वाली कॉलेज शिक्षिका रेशमा निशांत ने अपने फ़ेसबुक पन्ने पर लिखा कि वो इस बार मंदिर जा रही हैं क्योंकि अदालत का आदेश उनके उस सपने को पूरा कर रहा है जो उन्होंने लंबे वक्त से देखा है.
सोशल मीडिया पर उनके इस पोस्ट की कई लोगों ने आलोचना की है. कई लोगों ने तो उनके घर के सामने विरोध प्रदर्शन किया, नारे लगाए, उन्हें गालियां दीं. उन्हें ये धमकी भी दी गई कि अगर उन्होंने मंदिर में प्रवेश करने की कोशिश की तो उन्हें इसके गंभीर परिणाम भुगतने होंगे.
रेशमा निशांत कहती हैं, "मैंने उन्हें कुछ नहीं कहा. मुझे नहीं लगता कि वो किसी जवाब के हकदार भी हैं. मैंने इस मामले में पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है."
रेशमा लंबे समय से व्रत रख रही हैं. हर साल की तरह इस साल भी उन्होंने 41 दिनों तक उपवास में रहने की शपथ ली है.
वो कहती हैं, "इस बार, मेरे उपवास का 41वां दिन 17 अक्टूबर को पड़ेगा. इसलिए मैं 18 अक्तूबर को मंदिर जा सकती हूं."स बीच त्रावनकोर देवसम बोर्ड ने मंगलवार को पुजारियों के परिवार, पांडलम के शाही परिवार और अयप्पा सेवा संघ के अधिकारियों की एक बैठक बुलाई है. बैठक में मंदिर में प्रवेश करने संबंधी गतिरोध को ख़त्म करने पर चर्चा होगी ताकि पूजा की जा सके.
इससे पहले पिनाराई विजयन ने एक बैठक बुलाई थी जिसमें हिस्सा लेने से इन तीनों पक्षों ने इनकार कर दिया था.
मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ये साफ कर दिया है कि उनकी सरकार सुप्रीम कोर्ट में इस मामले में पुनर्विचार के लिए कोई याचिका दाखिल नहीं करेगी.
उनका कहना है कि इसके उलट उनकी सरकार एक शपथपत्र दाखिल कर कहा है कि सभी उम्र की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश दिया जाना चाहिए.
17 अक्तूबर यानी कपाट खुलने वाले दिन महिलाओं की सुरक्षा के मद्देनज़र उन्होंने कहा है, "हर हाल में कानून व्यवस्था बनाए रखने की कोशिश होगी ".
उन्होंने अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (साऊथ ज़ोन) अनिल कांत को स्थिति पर नज़र बनाए रखने के लिए कहा है और आदेश दिए हैं कि जो महिलाएं मंदिर में प्रवेश करना चाहती हैं उनके लिए उचित व्यवस्था की जाए ताकि वो बिना बाधा दर्शन कर सकें.

विदेशी मीडिया में छाया योगी का 'प्रयागराज' फ़ैसला

लाहाबाद का नाम प्रयागराज करने का फ़ैसला अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भी सुर्खियां बटोर रहा है. मंगलवार को उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार की कैबिनेट ने यह फ़ैसला लिया था.
ब्रिटेन के प्रमुख अख़बार द गार्डियन
द गार्डियन ने उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थनाथ सिंह के उस बयान का ज़िक्र किया है, जिसमें उन्होंने कहा था, ''इस शहर का नाम शुरू से ही प्रयागराज था. जो इस फ़ैसले का विरोध कर रहे हैं उन्हें सोचना चाहिए कि अगर माता-पिता का दिया उनका नाम बदल दिया जाए तो कैसा लगेगा?''
द गार्डियन ने लिखा है कि इस शहर का संबंध नेहरू-गांधी ख़ानदान से भी है जिसने भारत को तीन प्रधानमंत्री दिए. इसमें देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू भी शामिल हैं.
ब्रिटेन के ही अख़बार द इंडिपेंडेंट ने लिखा है, ''इस बदलाव का मक़सद पुराने नाम को बहाल करना है. मुस्लिम शासक अकबर ने 1583 में प्रयाग का नाम बदलकर इलाहाबाद कर दिया था.''
हालांकि प्रदेश की विपक्षी पार्टियां इस फ़ैसले का विरोध कर रही हैं. वहीं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा है कि जो भारत के इतिहास और परंपरा की समझ नहीं रखते हैं, वही इस फ़ैसले पर सवाल उठा रहे हैं.
द गार्डियन ने नाम बदलने के बहाने शहर की अहमियत का भी उल्लेख किया है.
गार्डियन की रिपोर्ट में लिखा गया है, ''इसी शहर में
मध्य-पूर्व के प्रमुख मीडिया घराना अल-जज़ीरा ने लिखा है, ''स्थानीय मीडिया के मुताबिक़, भारत के एक प्रांत उत्तर प्रदेश की सरकार ने अपने एक ऐतिहा
अल-जज़ीरा ने लिखा है, ''कई आलोचकों का ये भी कहना है कि इससे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हिंदू राष्ट्रवादी पार्टी भारत के विविधिता से भरे इतिहास और पहचान को मिटाने की कोशिश कर रही है. उत्तर प्रदेश में एक महंत योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने कई जगहों के नामों को बदलने का प्रस्ताव दिया है. योगी आदित्यनाथ के ऊपर भारत के मुस्लिम अल्पसंख्यक समुदाय के ख़िलाफ़ हिंसा भड़काने का आरोप लग चुका है.''
अल-जज़ीरा ने यह भी लिखा है, ''बीते साल उन्होंने मुग़लसराय रेलवे स्टेशन का नाम बदलकर बीजेपी नेता दीन दयाल उपाध्याय के नाम पर रख दिया था. इसके साथ ही बरेली, कानपुर और आगरा के हवाई अड्डों के नामों को बदलने का प्रस्ताव दिया गया है. उत्तर प्रदेश की 22 करोड़ लोगों की आबादी में मुसलमानों का प्रतिशत लगभग 19 फीसदी है.''
सिक शहर का मुस्लिम नाम बदलकर हिंदुओं की मान्यताओं से जुड़ा नाम रख दिया है. अगर इलाहाबाद के इतिहास की बात करें तो ये भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू का गृह नगर हुआ करता था.''
अल-जज़ीरा ने लिखा है, ''इस शहर का नया नाम प्रयागराज गंगा और यमुना नदी के संगम की ओर इशारा करता है, जहां पर जनवरी 2019 में हिंदुओं का कुंभ मेला आयोजित होने जा रहा है. इससे पहले साल 2013 में कुंभ मेले में 10 करोड़ लोग शामिल हए थे.विपक्षी पार्टी कांग्रेस के प्रवक्ता ओंकार सिंह ने कहा है कि इस शहर का नाम बदलने से आज़ादी की लड़ाई में इस शहर के योगदान पर असर पड़ता है.''
कुंभ मेले का आयोजन होता है. ऐसा माना जाता है कि यह सबसे विशाल धार्मिक अनुष्ठान है. 2013 में कुंभ मेले का आयोजन किया गया था और इसमें 10 करोड़ लोग शामिल हुए थे. नाम बदलने की मांग लंबे समय से दक्षिणपंथी हिन्दू समूह कर रहे थे. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने मुगलसराय रेलवे स्टेशन का नाम बदलकर भी दीनदयाल उपाध्याय कर दिया था.''
ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है, ''कट्टर हिन्दू राष्ट्रवादी योगी के नेतृत्व वाले उत्तर प्रदेश के एक शहर का मुस्लिम नाम बदलकर हिन्दू मान्यता से जुड़ा नाम रख दिया है. आदित्यनाथ प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं और उन पर मुसलमानों के ख़िलाफ़ हिंसा भड़काने का आरोप है.''
अख़बार ने लिखा है, ''राज्य सरकार ने शहर के पुराने नाम को फिर से बहाल कर दिया है. इस शहर का पुराना नाम प्रयाग ही था, जिसे मुग़ल काल में 16वीं सदी के आख़िर में इलाहाबाद कर दिया गया था.''
द गार्डियन ने लिखा है, ''प्रयाग संस्कृत का शब्द है, जिसका मतलब होता है त्याग स्थल. हिन्दुओं का मानना है कि ब्रह्मांड के रचयिता ब्रह्मा ने शहर में जहां गंगा और यमुना नदी मिलती है, वहां पहला अर्पण किया था.''

Thursday, 4 October 2018

धर्म बदलने के बाद हिन्दू में इन्हें कौन सी जाति मिलेगी

ह गांव जाट बहुल है. बाक़ी जातियां भी हैं, लेकिन वर्चस्व जाटों का ही है. प्रधान राजकुमार का कहना है कि इस गांव में साढ़े तीन हज़ार वोटर हैं और इसमें मुस्लिम साढ़े तीन सौ के आसपास हैं. गांव के मुसलमान इस वाक़ये पर कुछ बोलना नहीं चाहते हैं.
रात के नौ बज रहे थे और मस्जिद में 10 से 12 लोग बैठे हैं. उनसे इस धर्मांतरण के बारे में पूछा तो मोहम्मद इरफ़ान ने कहा, ''सब ठीक है जी. सब ठीक है. आप चाय लेंगे या कुछ और. ठंडा मंगाऊं?''
फिर पूछा कि ये सब कैसे हुआ और क्या कारण है. उनका फिर वही जवाब था, ''सब ठीक है. हमलोग बिल्कुल ठीक हैं.'' उन्होंने आख़िर में कहा, ''ख़ुदा के लिए अब कुछ मत पूछिए.''
यहां ख़ामोशी है, लेकिन गांव के प्रधान राजकुमार कहते हैं कि मुसलमान से कोई हिन्दू बनता है तो अच्छा ही लगता है जी. राजकुमार का अच्छा लगना इस परिवार के लिए कितना अच्छा होगा शायद यह सवाल पूरे परिवार को परेशान कर रहा है.
अख़्तर अली का परिवार पहले बागपत शहर के पास खूबीपुर निवाडा गांव में रहता था. इसी गांव ये एक साल रहे. इसी साल जुलाई महीने में इनके बेटे गुलशन का शव संदिग्ध हालत में लटका हुआ मिला था. बागपत के एसपी शैलेश पांडे कहते हैं कि इस परिवार ने पुलिस को सूचित किए बिना ख़ुद ही शव को उतारा और नहलाकर दफ़नाने चल दिया.
शैलेश कहते हैं, ''गांव से ही पुलिस को फ़ोन आया कि गुलशन नाम के व्यक्ति का शव मिला है और घर वाले दफ़नाने ले जा रहे हैं. पुलिस की गाड़ी वहां पहुंची तो क़ब्रिस्तान के रास्ते से शव को पोस्टमॉर्टम के लिए लाया गया. ये इस मामले में ख़ुद ही संदिग्ध हैं. इन्होंने पुलिस को बिना बुलाए शव क्यों उतारा? ये दफ़नाने में इतनी जल्दबाजी क्यों कर रहे थे? इन्होंने जो एफ़आईआर लिखवाई है उसमें भी यही कहा है कि उनके बेटे का शव लटका हुआ मिला.''
शैलेश का कहना है कि इसकी जांच चल रही है और जल्द ही सब कुछ साफ़ हो जाएगा.
अख़्तर अली जो अब धरम सिंह बन गए हैं, उनका कहना है कि 22 साल के गुलशन की हत्या की गई है और पुलिस इसकी जांच करने में कोताही बरत रही है. यही बात नौशाद कहते हैं. वो कहते हैं इस मुश्किल वक़्त में उनके कौम के लोगों ने भी साथ नहीं दिया, इसलिए हिन्दू धर्म अपनाने का फ़ैसला किया.
खूबीपुर निवाडा के लोगों का कहना है कि गुलशन ने ख़ुदकुशी की थी क्योंकि उसकी पत्नी को घर वाले एक साल से आने नहीं दे रहे थे. मुश्किल वक़्त में कौम के साथ नहीं देने के आरोप पर गांव वालों का कहना है कि अगर ऐसा होता तो क़ब्रिस्तान में शव को दफ़नाने ही नहीं दिया जाता.
क्या हिन्दू बनने से पुलिस इस जांच में अख़्तर अली के मन मुताबिक़ काम करेगी? शैलेश पांडे कहते हैं, ''पुलिस धर्म के आधार पर काम नहीं करती है. जांच हम तथ्यों के आधार पर करते हैं. अगर कोई ऐसा सोच रहा है तो बिल्कुल ग़लत है कि धर्म बदलने के कारण उसे मदद मिलेगी. इसी परिवार का नौशाद एसडीएम के पास एक शपथपत्र लेकर आया था कि वो हिन्दू धर्म से बहुत प्रभावित है और इसलिए स्वेछा वो हिन्दू बनने जा रहा है. धर्म बदलने का कोई सरकारी तरीक़ा नहीं है. आपको हिन्दू बनकर रहना है या मुसलमान, इससे प्रशासन को कोई लेना देना नहीं है.''
युवा हिन्दू वाहिनी का कहना है कि इनके पूर्वज जोगी जाति के थे इसलिए इन्हें जोगी जाति ही मिलेगी. अख़्तर अली के परिवार का भी कहना है कि वो फेरीवाले का काम करते हैं इसलिए ये जाति उनके पेशे से हिसाब से ठीक है. हालांकि शैलेश पांडे कहते हैं कि कोई ख़ुद से अपनी जाति नहीं चुन सकता है और अगर चुन भी लेता है तो उसे उस आधार पर सरकारी योजनाओं का फ़ायदा नहीं मिलेगा.
सूर्यास्त हो चुका है. बदरखा गांव अंधेरे में समा रहा है. अख़्तर अली के आंगन में भी रात दस्तक दे चुकी है. पर ये रात अब अख़्तर अली के आंगन में नहीं बल्कि धरम सिंह के आंगन में है. रुकै़या आटा गूंथ रही हैं. कल तक नौशाद के लिए रोटी बनाती थीं आज वो नरेंद्र के लिए रोटी बनाएंगी. रुक़ैया कहती हैं, ''क्या फ़र्क़ पड़ता है जी. हमें तो वही करना है जो रोज़ करती हूं. हिन्दू रहूं या मुसलमान.''

Monday, 1 October 2018

कितना कठिन था 'सर्जिकल स्ट्राइक' करके ज़िंदा लौट

वेक तिवारी की हत्या की चश्मदीद सना ख़ान को पुलिस ने शुरू में मीडिया से बात नहीं करने दी मगर बाद में दबाव पढ़ा तो उन्हें पत्रकारों के सामने लाया गया.
सना ने इस घटना के लिए पुलिसकर्मियों को ज़िम्मेदार ठहराते हुए कहा, "न तो हम रुके हुए थे और न ही आपत्तिजनक अवस्था में थे. हमारी ओर से कोई उकसावा नहीं था मगर कॉन्स्टेबल ने गोली चला दी."
सना ख़ान ने पत्रकारों से कहा, "हम कार्यक्रम से निकले और सर ने कहा कि वो मुझे घर छोड़ देंगे. मक़दूमपुर पुलिस पोस्ट के पास बाईं ओर से दो पुलिसवाले कार के बराबर आकर चलने लगे. वे चिल्लाए- रुको. मगर सर, गाड़ी चलाते रहे क्योंकि रात का समय था और उन्हें मेरी सुरक्षा की चिंता भी थी."
अपने देश में सबसे अधिक एयरपोर्ट बनाने का भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का दावा क्या वाक़ई में सच है?
प्रधानमंत्री ने बीते सप्ताह ट्वीट किया कि भारत में अब 100 हवाईअड्डे हैं और बीते चार सालों में मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद 35 हवाईअड्डे पूरी तरह बनकर तैयार हुए हैं.
विपक्षी पार्टियों पर तंज कसते हुए उन्होंने कहा था, "आज़ादी के 67 साल बाद, 2014 तक भारत में केवल 65 हवाईअड्डे ही थे. इसका मतलब है कि हर साल मात्र एक हवाईअड्डा बनाया गया."
इस आंकड़ों को देखें तो लगता है कि मौजूदा प्रशासन में हवाईअड्डे बनाने का काम तेज़ी से हुआ है और हर साल औसतन 9 हवाईअड्डे बनाए गए हैं.
लेकिय क्या आधिकारिक आंकड़े भी प्रधानमंत्री के इन दावों की पुष्टि करते हैं?
भारत में नागरिक विमान उड्डयन के बुनियादी ढ़ांचेकिन अगर हम इससे पहले के वक्त पर नज़र डालें तो तस्वीर धुंधली होती जाती है.
घरेलू हवाईअड्डों की संख्या के संबंध में डीजीसीए के आंकड़े बताते हैं -
  • साल 2015 में भारत में 95 हवाईअड्डे थे जिनमें से 31 काम नहीं कर रहे थे यानी "नॉन ऑपरेशनल" थे.
  • साल 2018 में देश में कुल 101 हवाईअड्डे हैं जिनमें से 27 "नॉन ऑपरेशनल" हैं.
इसका मतलब है कि 2015 के बाद से भारत में केवल 6 नए हवाईअड्डे बन कर तैयार हुए हैं या फिर हम कह सकते हैं कि और काम करने वाले यानी "ऑपरेशनल" हवाईअड्डे की संख्या 10 हो गई.
ये आंकड़ा प्रधानमंत्री मोदी के 2014 के बाद से 35 हवाईअड्डे बनाने के दावे से काफ़ी कम है.
इसी महीने दिल्ली में एक विमानन से जुड़े एक सम्मेलन में इंटरनेशनल एयर ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन (आईएटीए) के प्रमुख ऐलेक्ज़ेडर डी ज्यूनियैक ने हवाईअड्डे बनाने की भारत की कोशिशों की तारीफ
इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारत को अपनी एयरपोर्ट क्षमता और अधिक बढ़ाने की ज़रूरत है, और विमानन क्षेत्र में बुनियादी ढांचे का और विस्तार करने की मौजूदा बीजेपी सरकार की महत्वाकांक्षी योजनाएं भी हैं.
बीते साल सरकार ने टू-टियर शहरों यानी छोटे शहरों को हवाई रास्तों और बड़े शहरों से जोड़ने के लिए "उड़ान" योजना
धिक वक़्त लेने और आरामदेह ना होने के बवजूद भी अनेक भारतीय अब भी लंबी दूरी की यात्रा के लिए रेल को ही पसंद करते हैं क्योंकि ये सस्ता है.
हालांकि, लुसी बड कहती हैं, "भारत में मध्यवर्ग के ऐसे उपभोक्ताओं की संख्या तेज़ी से बढ़ रही है जिनके पास ख़र्च करने के लिए अधिक धन है और वो वक़्त को अधिक महत्व देते हैं. उनकी बढ़ती मांग के कारण घरेलू हवाई मार्गों के विकास को भी प्रोत्साहन मिल रहा है."
सच कहा जाए तो देश की राजधानी दिल्ली और उसकी आर्थिक राजधानी मुंबई के बीच दो घंटे का हवाई रास्ता अब दुनिया का सबसे व्यस्त रास्ता बन गया है.
आईएटीए के मुताबिक़ आने वाले 20 सालों में भारत में हर साल हवाई मार्ग से यात्रा करने वालों की संख्या 50 करोड़ से अधिक हो जाएगी.
लेकिन हाल में आई इसकी एक रिपोर्ट में कहा गया है कि हवाईअड्डे की संख्या (हर 10 लाख व्यक्ति की हवाईअड्डे पर एयरपोर्ट की संख्या) के मामले में भारत की रैंकिंग कम है.
आईएटीए के अनुसार इस क्षेत्र की क्षमता का पूर विकास करने के लिए, "सही समय पर और सही जगह पर, सही प्रकार के बुनियादी ढांचे की आवश्यकता होगी."
वास्तव में, कुछ जानकारों का मानना ​​है कि यात्रियों की संख्या में बढ़ोतरी का आलम कुछ ऐसा है कि भविष्य में बड़े शहरों को दूसरे हवाईअड्डे की आवश्यकता होगी.
शुरु की.
इस साल की शुरुआत में विमानन मंत्री जयंत सिन्हा ने कहा कि भारत को साल 2035 तक 150 से 200 एयरपोर्ट की ज़रूरत होगी. बीते दो दशकों से अधिक के वक़्त में भारत ने अपने विमानन को विदेशी निवेश के लिए खोला है.
यात्रियों की संख्या लगातार बढ़ रही है और देश में हवाई सेवाएं देने वाली कंपनियों के बीच भी प्रतिस्पर्धा है जिसके कारण हाल के सालों में हवाई यात्रा की क़ीमतों में भी गिरावट देखी गई है.
की थी.
उन्होंने कहा था, "बीते एक दशक में भारत में हवाईअड्डों के बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में जो विकास हुआ है वो आश्चर्यजनक है."
ऐलेक्ज़ेडर डी ज्यूनियैक ने जिस एक दशक की बात की है उसमें साल 2014 के बाद का वो वक्त भी आता है जब मोदी के नेतृत्व वाली सरकार सत्ता में आई.
यहां पर ये कहना ज़रूरी है कि मौजूदा सरकार के बीते चार साल के कार्यकाल में जो नए हवाईअड्डे खोले गए हैं उनका काम उनसे पहले की सरकार ने शुरु किया होगा, भले ही उन्हें पूरा करने का काम और उनका उद्घाटन मौजूदा प्रशासन में हुआ.
यूके के लॉफ़बोरो विश्वविद्यालय में हवाई परिवहन के बुनियादी ढांचे संबंधी मामलों की जानकार लूसी बड कहती हैं, "एयरपोर्ट बनाने के लिए उपभोक्ताओं की बढ़ती मांग का आकलन करना, इसके लिए ज़रूरी ज़मीन के अधिग्रहण करना और फिर काम शुरु करने के लिए ज़रूरी धन जुटाना होता है. इसका मतलब है कि एयरपोर्ट बनाने के लिए कई सालों पहले से योजना बनानी होती है."
के विकास के लिए एयरपोर्ट ऑथारिटी ऑफ़ इंडिया ज़िम्मेदार है. इसकी वेबसाइट पर मौजूद सूची के अनुसार भारत में कुल 101 एयरपोर्ट हैं.
भारत में देश के भीतर आने-जाने वाले हवाई यातायात पर विनियामक के तौर पर नागर विमानन महानिदेशालय (डीजीसीए) नज़र रखता है. इसकी रिपोर्ट के अनुसार देश में 13 मार्च 2018 तक 101 घरेलू एयरपोर्ट हैं.