बीबीसी की ख़ास रिसर्च
छत्तीसगढ़ के अलावा मध्यप्रदेश, राजस्थान, तेलंगाना और मिज़ोरम में चुनाव होने जा रहे हैं. इन राज्यों में चुनाव के साथ देश भर में एक तरह से 2019 के आम चुनाव की मुनादी हो जाएगी.
चुनावों का ना केवल सरकारों पर असर होता है बल्कि ख़बरों की दुनिया पर भी इसका प्रभाव देखने को मिलता है.
समाचार माध्यमों में चुनावी ख़बर प्रमुखता से नज़र आने लगती हैं. नेताओं
के चुनावी दौरों और चुनावी वादों की बड़ी-बड़ी तस्वीरें, बैनर और टीवी
चैनलों पर लाइव डिस्कशन की तादाद बढ़ जाती है. इस दौरान नेता और राजनीतिक
दल अपने अपने हक़ में हवा बनाने के लिए अपने पक्ष की चीज़ों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हैं.
इसके लिए मीडिया प्लेटफ़ॉर्म्स में ख़बरों के बीच पेड
न्यूज़ का घालमेल इस तरह होता है कि वो एकपक्षीय समाचार या विश्लेषण होते हैं, जो आम मतदाताओं के नज़रिये को प्रभावित करते हैं.
वरिष्ठ टीवी
पत्रकार राजदीप सरदेसाई कहते हैं, "चुनाव के समय इसीलिए आपको नए अख़बार और
टीवी चैनल दिखाई देने लगते हैं. वो इस मौक़े को भुनाने के लिए ही बाज़ार
में आते हैं. लेकिन अब बात केवल वहीं तक सीमित नहीं रह गई है. क्षेत्रीय
मीडिया ही नहीं बल्कि बड़े-बड़े अख़बार और मीडिया समूह भी इस मौक़े को भुनाना चाहते हैं."
ये खेल किस तरह होता है, इसका अंदाज़ा चुनाव आयोग
के आंकड़ों से होता है. बीते चार साल में 17 राज्यों में हुए चुनाव के
दौरान पेड न्यूज़ की 1400 से ज़्यादा शिकायतें सामने आई हैं.
बीते पंजाब विधानसभा चुनाव के दौरान पेड न्यूज़ की 523, गुजरात चुनाव में 414 और
हिमाचल चुनाव में 104 शिकायतें सामने आईं थीं. इस साल कर्नाटक में हुए चुनाव में पेड न्यूज़ की 93 शिकायतें दर्ज की गईं.
इन शिकायतों से स्पष्ट है कि पेड न्यूज़ के मामले दर्ज हो रहे हैं. यही
वजह है कि चुनाव आयोग ने चुनावी ख़र्चे के लिए निगरानी समिति का गठन किया है जो उम्मीदवारों के ख़र्च पर नज़र रखती है.
छत्तीसगढ़ में कुछ
अख़बारों और ख़बरिया चैनलों में संपादकीय ज़िम्मेदारी निभा चुके दिवाकर मुक्तिबोध कहते हैं, "पेड न्यूज़ का मामला नया तो नहीं है, लेकिन अब इसका
रूप व्यापक हो चुका है. हर अख़बार और चैनल चुनाव को पैसे बनाने के मौक़े के
तौर पर देखते हैं, लिहाज़ा उनका उम्मीदवारों और राजनीतिक दलों से एक तरह
का अघोषित समझौता होता है और पक्ष में ख़बरों के ज़रिए माहौल तैयार कराया
जाता है."
में हमने पाया कि दुनिया के दूसरे हिस्सों के साथ-साथ भारत में फ़ेक न्यूज़ का प्रसार कितनी तेज़ी से और किस
तरह बढ़ रहा है.
लेकिन ख़बरों की दुनिया में फ़ेक न्यूज़ कोई अकेली
बीमारी नहीं है. एक ऐसी ही बीमारी है पेड न्यूज़, जिसने मीडिया को अपनी
चपेट में ले रखा है. कई बार दोनों का रूप एक भी हो सकता है और कई बार अलग
अलग भी. वैसे पेड न्यूज़ की बीमारी को आप थोड़ा गंभीर इसलिए मान लें क्योंकि इसमें बड़े-बड़े मीडिया संस्थानों से लेकर दूर दराज़ के क़स्बाई मीडिया घराने शामिल हैं.
पेड न्यूज़, जैसा कि नाम से ही ज़ाहिर है
वैसी ख़बर जिसके लिए किसी ने भुगतान किया हो. ऐसी ख़बरों की तादाद चुनावी
दिनों में बढ़ जाती है और छत्तीसगढ़ में पहले चरण के मतदान के साथ ही देश
के पांच राज्यों के चुनावी घमासान की शुरुआत हो चुकी हैचुनाव आयोग मध्य प्रदेश चुनावों को लेकर अतिरिक्त सर्तकता भी बरत रहा है, क्योंकि 2013 के विधानसभा चुनाव में इस राज्य से पेड न्यूज़ की 165
शिकायतें सामने आईं थीं.
मध्य प्रदेश के इंदौर में लंबे समय से
पत्रकारिता कर रहे वरिष्ठ पत्रकार समीर ख़ान बताते हैं, "पेड न्यूज़ का तौर
तरीक़ा बदलता रहा है, एक नया तरीक़ा तो ये भी है कि भले आप हमारे पक्ष में
कुछ नहीं छापो, लेकिन हमारे ख़िलाफ़ वाली ख़बर तो बिल्कुल मत छापो. मतलब
आप कुछ नहीं भी छापेंगे तो भी आपको पैसे मिल सकते हैं और ये ख़ूब हो रहा
है."
भारत में पेड न्यूज़ की स्थिति को लेकर भारतीय प्रेस काउंसिल की
एक सब-कमेटी की ओर से परंजॉय गुहा ठाकुराता और के श्रीनिवास रेड्डी ने
मिलकर एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार की थी. लंबे समय तक उसे सार्वजनिक नहीं किया गया. फिर 2011 में तत्कालीन केंद्रीय सूचना आयुक्त के आदेश के बाद इस
रिपोर्ट को जारी किया गया.
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